Monday, August, 17,2026

अब रक्त की हर दूसरी यूनिट पर सरकारी ब्लड बैंक का हक

जयपुर: प्रदेश में स्वैच्छिक रक्तदान की व्यवस्था में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव किया गया है। राज्य सरकार ने नया स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) लागू करते हुए स्वैच्छिक रक्तदान शिविरों में राजकीय ब्लड सेंटरों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 50 प्रतिशत कर दी है। यानी अब किसी भी रक्तदान शिविर में एकत्रित होने वाला हर दूसरा यूनिट रक्त सरकारी ब्लड सेंटर के पास जाएगा।

सरकार का साफ संदेश है कि समाज के सहयोग से मिलने वाला स्वैच्छिक रक्त सबसे पहले सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के इलाज के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। इस फैसले से न केवल सरकारी ब्लड बैंकों में रक्त की उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि मरीजों के परिजनों पर रिप्लेसमेंट डोनर लाने का दबाव भी काफी हद तक कम होने की उम्मीद है। प्रदेश में वर्षों से सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के परिजनों को रक्त की व्यवस्था के लिए रिप्लेसमेंट डोनर लाना पड़ता रहा है। कई बार जरूरतमंद मरीजों का उपचार केवल इसलिए प्रभावित होता था, क्योंकि समय पर रक्तदाता नहीं मिल पाता था। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि अब स्वैच्छिक रक्तदान का बड़ा हिस्सा सीधे सरकारी ब्लड सेंटरों तक पहुंचेगा तो रक्त की उपलब्धता बढ़ेगी और रिप्लेसमेंट डोनेशन की आवश्यकता लगातार घटेगी।

हर साल 60 हजार अतिरिक्त यूनिट रक्त मिलेगा सरकार को

नई एसओपी के तहत सरकारी हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दी गई है। यानी सरकारी ब्लड सेंटरों को मिलने वाला हिस्सा 30 प्रतिशत बढ़ गया है। स्वास्थ्य विभाग के अनुमान के अनुसार इससे हर वर्ष करीब 60 हजार अतिरिक्त यूनिट रक्त सरकारी ब्लड बैंकों तक पहुंचेगा। वर्तमान में सरकारी ब्लड बैंकों में लगभग चार लाख यूनिट रक्त संग्रह होता है, जो नई व्यवस्था लागू होने के बाद बढ़कर करीब 4.60 लाख यूनिट तक पहुंच सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार एक यूनिट रक्त से रेड सेल, प्लाज्मा और प्लेटलेट्स जैसे कई रक्त अवयव तैयार किए जाते हैं। ऐसे में 60 हजार अतिरिक्त यूनिट का मतलब लाखों मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध होना है।

मरीजों व उनके परिजनों को मिलेगी राहत

प्रदेश में हर साल लगभग 9 लाख यूनिट रक्त संग्रह होता है। करीब 4 लाख यूनिट सरकारी ब्लड बैंकों में एकत्रित होता है। सरकारी ब्लड बैंकों में उपलब्ध रक्त का 73 प्रतिशत स्वैच्छिक रक्तदान से आता है। शेष 27 प्रतिशत रक्त रिप्लेसमेंट डोनेशन के जरिए जुटाया जाता है। यही 27 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ था, क्योंकि इसका सीधा बोझ मरीजों और उनके परिजनों पर पड़ता है।

निजी ब्लड बैंकों का नेटवर्क बना कारण

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में प्रदेशभर में निजी ब्लड बैंकों की संख्या तेजी से बढ़ी। सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और स्वयंसेवी समूहों की ओर से आयोजित अधिकांश रक्तदान शिविर भी निजी ब्लड बैंकों के माध्यम से होने लगे। परिणाम यह हुआ कि समाज के सहयोग से एकत्रित स्वैच्छिक रक्त का बड़ा हिस्सा निजी ब्लड बैंकों तक पहुंचता रहा, जबकि सरकारी अस्पतालों के ब्लड बैंक अपेक्षित मात्रा में रक्त से वंचित रहे। कई सरकारी अस्पतालों में ब्लड बैंक होने के बावजूद मरीजों के परिजनों को रिप्लेसमेंट डोनर लाने के लिए कहा जाता रहा। नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक स्वैच्छिक रक्तदान शिविर में संबंधित राजकीय ब्लड सेंटर की प्रशिक्षित मेडिकल टीम की उपस्थिति अनिवार्य होगी।

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