Friday, October, 30,2026

आधुनिकता की चकाचौंध में धीमी पड़ी मिट्टी के दीयों की लौ

जयपुर:  दीपावली का नाम आते ही मिट्टी के दीयों की सौंधी खुशबू, चाक पर घूमती मिट्टी और घर- आंगन में जगमगाती दीपमालाएं याद आती हैं। कभी त्योहार की तैयारी मिट्टी के दीयों के बिना अधूरी मानी जाती थी, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में अब इन दीयों की लौ धीमी पड़ने लगी है। बाजार में एलईडी लाइटों, रंग-बिरंगी झालरों और डिजाइनर मोमबत्तियों का चलन बढ़ने से कुम्हारों के पुश्तैनी कारोबार पर असर पड़ा है। विडंबना यह है कि दीये बनाने की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन कारीगरों के हुनर का मोल आज भी कम हो है। जयपुर के घी वालों का रास्ता स्थित पुराने कुम्हार मोहल्ले में कन्हैयालाल प्रजापत की कहानी इस बदलाव की तस्वीर दिखाती है। कन्हैयालाल बताते हैं कि दो-तीन दशक पहले इस मोहल्ले में 80 से 100 परिवार मिट्टी के बर्तन, दीये, कलश और सकोरे बनाने का काम करते थे। अब यहां मुश्किल से 10 से 15 परिवार ही इस पुश्तैनी काम से जुड़े हैं। पहले दीपावली के सीजन में एक परिवार 10 से 15 हजार दीये तक बेच लेता था, लेकिन अब मांग घटने से तैयार माल घरों में ही पड़ा रह जाता है।

नई पीढ़ी बना रही है दूरी

हाथों की मेहनत से तैयार होने वाले दीये दीपावली पर घरों को रोशन करने के इंतजार में हैं। चाक के मशीनी होने से उत्पादन की गति जरूर बढ़ी है, लेकिन कुम्हारों की आर्थिक स्थिति में खास बदलाव नहीं आया। कम आमदनी और अनिश्चित माग के कारण नई पीढी इस काम से दूरी बना रही है। ऐसे में सदियों पुरानी कला के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो रहा है।

मिट्टी महंगी, दीयों के दाम जस के तस

कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल की बढ़ती कीमत है। कन्हैयालाल के अनुसार, कभी 300 से 400 रुपए में मिलने वाली मिट्टी की ट्रॉली या लड्डा अब 3,000 से 5,000 रुपए तक में मिल रहा है। दूसरी ओर, बाजार में दीये करीब एक रुपए प्रति पीस या थोक में 60 से 80 रुपए सैकड़ा बिकते हैं। सकोरे, कलश और मटके बनाने में भी मेहनत और लागत लगती है, लेकिन बिक्री से होने वाली कमाई उस अनुपात में नहीं बढ़ी। मिट्टी का मोल बढ़ गया, पर हुनर अब भी सस्ता है।

समाज और सरकार के सहयोग की जरूरत

कुम्हारों को उम्मीद है कि इस दीपावली लोग मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता देंगे। स्थानीय स्तर पर मेले, बाजार और बिक्री के लिए विशेष स्थान उपलब्ध कराने, सरकारी योजनाओं की जानकारी और कारीगरों को आर्थिक सहायता देने जैसे प्रयास इस कला को संबल दे सकते हैं। समाज भी सीधे कुम्हारों से दीये खरीदकर उनकी आजीविका में योगदान दे सकता है। पर्यावरण के अनुकूल और परंपरा से जुड़े मिट्टी के दीयों को अपनाना सिर्फ त्योहार की सुंदरता बढ़ाना नहीं, बल्कि उस हुनर को बचाना भी है, जो पीढ़ियों से भारतीय संस्कृति को रोशन करता आया है। सवाल यही है कि जब मिट्टी महंगी और हुनर सस्ता होता जा रहा है, तो इस परंपरा की लौ जलाए रखने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

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